Mon, 18 May 2026
Breaking News
परसपुर/करनैलगंज/ गोंडा : "कांपती क्यों है सत्ता की छतरी, अदम के कदम की थाप से-व्यवस्था से टकराने वाले शायर थे अदम गोंडवी " | परसपुर/करनैलगंज/ गोंडा : माँ पाटेश्वरी विश्वविद्यालय की द्वितीय सेमेस्टर परीक्षाएं 29 मई से होंगी शुरू | Big News Shekhar News : शेखर न्यूज़ पर शाम 6:30 बजे तक की प्रमुख खबरें | परसपुर, गोंडा : मुस्लिम युवकों ने हिंदू नाम से ज्योतिषी बन तंत्र-मंत्र के नाम पर की लाखों की ठगी, पांच गिरफ्तार | शेखर न्यूज़ उत्तर प्रदेश बैजलपुर लखनऊ कानपुर गाजियाबाद : शाम 4:30 बजे की बड़ी एवं प्रमुख खबरें...................* | दोपहर की देश राज्यों से प्राप्त बड़ी खबरे... : Shekhar News u. P | देश राज्यों से बड़ी खबरें शेखर न्यूज़ यू पी : शेखर न्यूज़ उत्तर प्रदेश गोरखपुर प्रयागराज लखनऊ सीतापुर कानपुर गाजियाबाद | परसपुर, गोंडा : आकाशीय बिजली की तरंग से उपडाकघर के चार कंप्यूटर सिस्टम ठप | परसपुर , गोंडा : माघ मेले के सफल अधिकारी दयानंद प्रसाद बने गोंडा के नए सीडीओ, अंकिता जैन मातृत्व अवकाश पर रवाना | परसपुर, गोंडा : सेवानिवृत्त हवलदार गिरीश पाल यादव के प्रथम गृह आगमन पर हुआ भव्य स्वागत | परसपुर/करनैलगंज/ गोंडा : "कांपती क्यों है सत्ता की छतरी, अदम के कदम की थाप से-व्यवस्था से टकराने वाले शायर थे अदम गोंडवी " | परसपुर/करनैलगंज/ गोंडा : माँ पाटेश्वरी विश्वविद्यालय की द्वितीय सेमेस्टर परीक्षाएं 29 मई से होंगी शुरू | Big News Shekhar News : शेखर न्यूज़ पर शाम 6:30 बजे तक की प्रमुख खबरें | परसपुर, गोंडा : मुस्लिम युवकों ने हिंदू नाम से ज्योतिषी बन तंत्र-मंत्र के नाम पर की लाखों की ठगी, पांच गिरफ्तार | शेखर न्यूज़ उत्तर प्रदेश बैजलपुर लखनऊ कानपुर गाजियाबाद : शाम 4:30 बजे की बड़ी एवं प्रमुख खबरें...................* | दोपहर की देश राज्यों से प्राप्त बड़ी खबरे... : Shekhar News u. P | देश राज्यों से बड़ी खबरें शेखर न्यूज़ यू पी : शेखर न्यूज़ उत्तर प्रदेश गोरखपुर प्रयागराज लखनऊ सीतापुर कानपुर गाजियाबाद | परसपुर, गोंडा : आकाशीय बिजली की तरंग से उपडाकघर के चार कंप्यूटर सिस्टम ठप | परसपुर , गोंडा : माघ मेले के सफल अधिकारी दयानंद प्रसाद बने गोंडा के नए सीडीओ, अंकिता जैन मातृत्व अवकाश पर रवाना | परसपुर, गोंडा : सेवानिवृत्त हवलदार गिरीश पाल यादव के प्रथम गृह आगमन पर हुआ भव्य स्वागत | परसपुर/करनैलगंज/ गोंडा : "कांपती क्यों है सत्ता की छतरी, अदम के कदम की थाप से-व्यवस्था से टकराने वाले शायर थे अदम गोंडवी " | परसपुर/करनैलगंज/ गोंडा : माँ पाटेश्वरी विश्वविद्यालय की द्वितीय सेमेस्टर परीक्षाएं 29 मई से होंगी शुरू | Big News Shekhar News : शेखर न्यूज़ पर शाम 6:30 बजे तक की प्रमुख खबरें | परसपुर, गोंडा : मुस्लिम युवकों ने हिंदू नाम से ज्योतिषी बन तंत्र-मंत्र के नाम पर की लाखों की ठगी, पांच गिरफ्तार | शेखर न्यूज़ उत्तर प्रदेश बैजलपुर लखनऊ कानपुर गाजियाबाद : शाम 4:30 बजे की बड़ी एवं प्रमुख खबरें...................* | दोपहर की देश राज्यों से प्राप्त बड़ी खबरे... : Shekhar News u. P | देश राज्यों से बड़ी खबरें शेखर न्यूज़ यू पी : शेखर न्यूज़ उत्तर प्रदेश गोरखपुर प्रयागराज लखनऊ सीतापुर कानपुर गाजियाबाद | परसपुर, गोंडा : आकाशीय बिजली की तरंग से उपडाकघर के चार कंप्यूटर सिस्टम ठप | परसपुर , गोंडा : माघ मेले के सफल अधिकारी दयानंद प्रसाद बने गोंडा के नए सीडीओ, अंकिता जैन मातृत्व अवकाश पर रवाना | परसपुर, गोंडा : सेवानिवृत्त हवलदार गिरीश पाल यादव के प्रथम गृह आगमन पर हुआ भव्य स्वागत |

परसपुर/करनैलगंज/ गोंडा : "कांपती क्यों है सत्ता की छतरी, अदम के कदम की थाप से-व्यवस्था से टकराने वाले शायर थे अदम गोंडवी "

LIVE

नीरज कुमार सिंह संवाददाता परसपुर गोंडा / Mon, May 18, 2026 / Post views : 10

Share:

समाज और सत्ता के बीच एक अजीब सा वितंडावाद पसरा होता है. समाज बदलाव चाहता है. सत्ता यथास्थिति. इसलिए यथास्थिति को चुनौती देने वाला व्यक्ति सत्ता के लिए विद्रोही है और समाज के लिए नायक, क्रांतिकारी. इस तरह एक लकीर दोनों के बीच बनी रहती है कि तुम्हारा नायक हमारे प्रतिष्ठानों और परंपराओं में शामिल नहीं किया जाएगा क्योंकि वो तो हमारी ही चूलें हिलाना चाहता है. समाज अपने तरीकों से अपने नायक को याद करता और जानता है. लेकिन इतिहास क्योंकि सत्ता के नियंत्रण में होता है, तो सत्ता ऐसे नायकों को इतिहास का हिस्सा बनाने से रोकती रहती है.ऐसा ही नायक है हिंदी का जनकवि अदम. यानी अदम गोंडवी.

अदम कविता में अचरज हैं. उनकी कविता में कबीर का विद्रोह है. धूमिल की जनपक्षधरता, दुष्यन्त का अंदाज़े बयॉं और मुक्तिबोध की अभिव्यंजना भी. उनकी ग़ज़लें प्रेम और सौन्दर्य की नहीं मुफलिसी, भुखमरी और बेबसी के हवाले हैं. उनकी कविताएँ इश्क़, मोहब्बत, प्रेम और सौन्दर्य की चाशनी में पगी नहीं हैं. वो तो श्रम और पसीने से धुली, निखरी और आमजन की दुश्वारियों में भीगी हुई हैं. भाषा चिकनी चुपड़ी नहीं, खुरदुरी है. व्यंग्य की वेधकता है. पीड़ित और शोषितों के लिए तंत्र और व्यवस्था से मुठभेड़ करते अदम बेख़ौफ़ और बेमुरव्वत हैं. जनता के लिए अदम सबसे दो दो हाथ करने के लिए तैयार हैं. शायद इसीलिए वे आलोचकों और हिन्दी साहित्य के लिए असहज रहे. उनका साहित्यिक मूल्यांकन नहीं हुआ. हाशिए के लोगों के पक्ष में तंत्र और व्यवस्था से जूझते जो काम बिजनौर में दुष्यंत, बनारस में धूमिल, रायपुर में मुक्तिबोध कर रहे थे वही काम गोंडा में अदम कर रहे थे. अदम की ग़ज़लों और नज़्मों की किताब "समय से मुठभेड़" है. जिसमें वे सचमुच समय से मुठभेड़ करते हैं.

यह हिन्दी का दुर्भाग्य है कि अदम के साथ अकादमिया ने वो न्याय कभी नहीं किया, जिसके वे हकदार थे. हिन्दी समाज और अकादमियों ने उनकी उपेक्षा ही की. विश्वविद्यालयों में बैठे हिन्दी का मुस्तकबिल लिखने वाले आलोचकों ने उन्हें नज़र अंदाज़ किया. क्योंकि अदम मुँहफट थे. वे आलोचकों को देखते ही अपना मुँह उत्तर की ओर कर लेते थे ताकि आलोचक उनके दख्खिन रहें. ऐसे माहौल में कवि आलोचक डॉ जय नारायण बुधवार की किताब ‘जनकवि अदम गोंडवी’ अदम को उनके समय और समाज के साथ समझने का एक गम्भीर प्रयास है. किताब कुछ महीने पहले आई है. पर सामग्री दस बरस पहले “कल के लिए” पत्रिका के अदम पर केन्द्रित विशेषांक की है.

बुधवार जी का यह प्रयास स्तुत्य है. अभिनंदनीय है. इस किताब में देश के अनेक प्रतिष्ठित साहित्यकारों के लेख हैं, जो अदम की कविता और उनके सामाजिक सरोकारों को नई दृष्टि देते हैं. वह भारत जिसकी हथेलियों पर मेहनत की दरारें हैं. आंखों में बुझते सपनों की राख. पेट में पीढ़ियों से पलती भूख. देह पर पसीने की जलन और आत्मा पर व्यवस्था के नाखूनों के निशान हैं, अदम गोंडवी उसी भारत के शायर हैं. बुधवार जी जब अदम को फिर से मंच पर खड़ा करते हैं तो जनपक्षधरता के संकल्प को एक साक्षी व वकील और मिल जाता है. यह वकालत एक कवि की नहीं है, उस कृतित्व की है, जो उस कवि की पहचान भी है और जन की भी. अदम की कविता और आमजन, दोनों एक ही तो हैं. आप आमजन को देखें, या अदम की कविता पढ़ लें, बात एक ही है.

जय नारायण बुधवार की यह किताब अदम को फिर से कविता के केंद्र में खड़ा करने का सार्थक प्रयास है. यह केंद्र बहस और विमर्श का भी है और सामाजिक सरोकारों की प्रासंगिकता के पीछे सत्य के बिंबों का भी. ऐसे बिंब व्यवस्थावादियों द्वारा अक्सर नापसंद किए जाते हैं. और व्यवस्था नेरेटिव को नियंत्रित करती है. इसलिए अदम को पढ़ा बहुत गया, पर स्वीकार कम किया गया. जनता ने उन्हें याद रखा, मगर संस्थानों ने भुला दिया. क्योंकि अदम गोंडवी कविता नहीं, साहित्यिक सुविधा पर प्रश्नचिह्न थे. तभी तो वे कहते हैं-

“गजल को ले चलो अब गांव के दिलकश नजारों में

मुसलसल फन का दम घुटता है इन अदबी अदारों में.”

अदम वो शायर है जो खेतों की मेड़, ईंट-भट्टों के ताप, चरमराती झोपड़ियों में बुझते जीवन और अधजली रोटियों के धुएँ में हर रोज़ सांस लेता है. शहरी विकास के रंगीन इश्तेहारों के पीछे छिपे अंधेरे को पहचानने वाला शायर. ग़ज़ल के नफ़ीस चोंचलों, बनावटी इंकलाबों और अदबी आडंबरों से दूर खड़ा शायर. हुकूमत के बनाए सिस्टम को ठेंगे पर रखने वाला शायर. जिसे महबूब की जुल्फों से ज्यादा किसान की सूखी हथेलियां दिखाई देती हैं. जिसे माशूक की तन्हाई नहीं अधमरों की सिसकियां सुनाई देती हैं. जिसकी गजलों में इश्क का सौंदर्य नहीं, भूख का यथार्थ दिखाई देता है. वह अदम गोंडवी सिर्फ एक शायर नहीं, हिंदी-उर्दू गजल परम्परा में जनता की तरफ से दर्ज की गई सबसे सच्ची गवाही है.

जिंदगी दुश्वार है उफ़ ये गरानी देखिए.

और फिर नेताओं की शोला बयानी देखिए.

भीख का लेकर कटोरा, चांद पर जाने की जिद

ये अदा, ये बांकपन, ये लन्तरानी देखिए.

मुल्क जाए भाड़ में इससे उन्हें मतलब नहीं,

कुर्सी से चिपटे हुए हैं जांफिसानी देखिए.

अदम गोंडवी की कविताओं से मेरा पहला परिचय 1987 में हुआ था. मैं लखनऊ में नया-नया था. तब वहॉं दारूलशफा ही विधायक निवास होता था. बाकी के मंत्री आवास और विधायक निवास बने नहीं थे. नौकरी भी नई नई थी. बलिया के एक मंत्री जो दारूलशफा में ही रहते थे. उनसे मिलने गया था. मंत्री जी ने सायंकालीन कार्यक्रम शुरू कर दिया था. वहीं अदम साहब बैठे थे. गोष्ठी आगे बड़ी ही थी की उनका कण्ठ फूटा-

“काजू भुने हैं प्लेट में व्हिस्की गिलास में,

उतरा है रामराज विधायक निवास में.

पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत,

इतना असर है खादी के उजले लिबास में.

आजादी का वो जश्न मनाएं तो किस तरह

जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में.”

गजब की करिश्माई लाईनें थी. यह अदम का भोगा हुआ यथार्थ था. बेहद सादे सरल. तभी से मैं उनका मुरीद हुआ. बाद में 2011 में अदम चले ही गए. बिल्कुल मजाज लखनवी की तरह. मुझे तभी अदम की गजलों में कबीर के दोहे की गंध दिखने लगी थी. मैं अदम को कबीरपंथी रचनाकारों की कड़ी का आखिरी सिपाही मानता हूँ. वही फक्कड़पन, वही अल्हड़पना , वही मलंगई… कबीर ने पाखंड पर हमला किया और अदम ने लोकतांत्रिक ढोंग पर. कबीर मंदिर और मस्जिद के बीच खड़े होकर आदमी खोज रहे थे, अदम संसद और गांव के बीच खड़े होकर इंसाफ. दोनों की भाषा अलग हो सकती है, समय अलग हो सकता है, लेकिन दोनों की बेचैनी एक ही जगह से पैदा होती है- आदमी की दुर्दशा से. कबीर की तरह अदम भी असुविधाजनक कवि थे. वे व्यवस्था के लिए भी असुविधाजनक थे और साहित्य के लिए भी. कबीर ने कहा था- “सांच कहो तो मारन धावे.” अदम का पूरा साहित्य ही इस परंपरा का झंडाबरदार है. देखिए-

“जो डलहौजी न कर पाया

वो ये हुक्काम कर देंगे

कमीशन दो

तो हिन्दुस्तान को

नीलाम कर देंगे।”

साम्प्रदायिक राजनीति के ज़हर पर वे सचेत करते हैं-

“हिंदू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िए,

अपनी कुरसी के लिए जज़्बात को मत छेड़िए,

हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है,

दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िए.

ग़लतियाँ बाबर की थी; जुम्‍मन का घर फिर क्यों जलें”

उनकी ग़ज़लों में एक आक्रामक ठसक है. यह ठसक अभिजात्य की नहीं, जनता की है. वह सीधे हमला करते हैं. जो मन में आया कह देते हैं और वह ग़ज़ल बन जाती है. घुमा-फिराकर नहीं बोलते. इसलिए उनकी कविता पढ़ते हुए आदमी चौंकता है. उसे लगता है कि शायर तो उसी की ज़ुबान बोल रहा है. अदम की कविता उस जमीन पर उतरती है जहां आदमी अपने पूरे सच के साथ खड़ा है—अधूरा, थका हुआ, और फिर भी जिंदा. वो जनवादी कवियों की मंडली में अलग चमकते हैं. मैं उन्हें उस महानता की श्रृंखला का हिस्सा नहीं, उसी महफिल का हिस्सा मानता हूँ; जहां बाबा नागार्जुन की कविता में सड़क पर उतर आया हुआ यथार्थ है, मुक्तिबोध में भीतर तक उतरती हुई सभ्यता की आलोचना है, धूमिल में लोकतंत्र का विखंडन है, दुष्यंत में राजनीतिक विडंबना की ग़ज़लनुमा तीव्रता है, वहीं अदम गोंडवी इन सभी प्रवृत्तियों को एक ऐसी सीधी, निर्भीक और किसान-जनित भाषा में पुनः रच देते हैं जो किसी बौद्धिक मध्यस्थता की मोहताज नहीं रहती. मसलन-

मुक्तिकामी चेतना

अभ्यर्थना इतिहास की.

यह समझदारों की दुनिया है

विरोधाभास की.

क्या व्यवस्था ने आखिर

नई पीढ़ी को क्या दिया?

सेक्स की रंगीनियां,

या गोलियां

सल्फास की.

कविता क्या है ? कविता आत्मा से आत्मा का गहरा संवाद है. पर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल कहते हैं-जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञान दशा कहलाती हैं. उसी प्रकार ह्रदय की मुक्तावस्था रस दशा कहलाती है.ह्रदय की इस मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आयी है. उसे कविता कहते हैं. पर अदम के यहॉं कविता की यह चौहद्दी बदल जाती है. अदम के यहॉं लाचार बेबस लोगों के हक की लड़ाई का हथियार है कविता.

अदम न तो बनावटी वैचारिकता का बोझ लेकर चलते हैं. न ही सजावटी प्रतिरोध. उनकी कविता ऐसा सीधा हस्तक्षेप है जो व्यवस्था को उसी की भाषा में चुनौती देती है. इसी कारण अदम केवल इस परंपरा के उत्तराधिकारी नहीं, बल्कि उसके सबसे तीखे समकालीन विस्तार की तरह दिखाई देते हैं- जहां कविता फिर से आदमी के पक्ष में खड़ी होकर बोलने लगती है. तभी तो वे कहते हैं-

“ये अमीरों से हमारी फैसलाकुन जंग थी

फिर कहां से बीच में मस्जिद और मंदिर आ गए. “

सरकारी दस्तावेजों में अदम गोंडवी का नाम ठाकुर रामनाथ सिंह दर्ज है. जिला-गोंडा, कस्बा- आटा परसपुर, ग्राम-गजरामपुरवा. बाकी का पता अदम खुद बताते हैं-

“फटे कपड़ों से तन ढांके गुजरता हो जिधर कोई

समझ लेना वो पगडंडी अदम के गांव जाती है.”

अदम स्कूल में कम पढ़े, उन्होंने जिंदगी को ज्यादा पढ़ा. अदम की शुरुआती समझ किसी विचारधारा की किताबों से नहीं बनी, बल्कि गंवई जीवन, खेती की लाचारी, खेतिहर मजदूरों, और वंचित जीवन की वास्तविकताओं से बनी. उनके गुरु ने उन्हें ‘अदम’ नाम दिया था. अदम अरबी भाषा से आया शब्द है. जिसका मतलब है अभाव. जीवनभर अदम उसी शून्यता को पढ़ते रहे. वे किसी वैचारिक नारे से प्रतिबद्ध कवि नहीं थे, बल्कि उस पीड़ा के कवि थे जो रोज़मर्रा के जीवन में चुपचाप बहती रहती है. मिसाल देखिए-

“जो उलझकर रह गई फाइलों के जाल में

गांव तक वो रोशनी आएगी कितने साल में.”

गुरूदेव नामवर जी कहते थे कि लेखक को जनपक्षधर बनने के लिए पहले अपने आप को ‘डीक्लास’ करना होगा. अदम अपने आप को ‘डीक्लास’ ही नहीं ‘डीकास्ट’ भी करते हैं. ठकुरई उनके नाम में कम, कलम से फूटती है. ये अगड़ा, पिछड़ों का पैरोकार ज्यादा है. जो पूरब में जातिवाद की बेड़ियों को सूत के धागे जैसा तोड़ता है. अपने समजातीय वर्ग पर एक सच्ची घटना का इल्जाम खुलेआम मढ़ता है. और शोषित वर्ग की लड़की को ‘सरजूपार की मोनालिसा’ कहकर बुलाता है. पढ़िए तो लगता है कि अदम गोंडवी होने की पहली शर्त हुनर नहीं हिम्मत है. ये हिम्मत की गवाही देखिए.

“आइए महसूस किजिए ज़िंदगी के ताप को.

मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको.

जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर.

मर गई फुलिया बिचारी एक कुएँ में डूब कर.

है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी.

आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी.

चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा.

मैं इसे कहता हूँ सरजूपार की मोनालिसा.”

ठाकुरों के गॉंव परसपुर में रहते हुए. अदम ने जो कविता ‘चमारो की गली’ लिखी. उससे उनके साहस और ख़ुद्दारी का अंदाज़ किया जा सकता है.

"पड़ गयी इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में,

वे इकट्ठे हो गए सरपंच की दालान में,

दृष्टि जिसकी थी जमीं भाले की लम्बी नोक पर,

देखिए सुखपाल सिंह बोले हैं खैनी ठोंक कर.

क्या करें सरपंच भाई क्या जमाना आ गया,

कल तलक जो पॉंव के नीचे था रुतबा पा गया.

विकास के सरकारी दावों पर एक और रचना देखिए-

तुम्‍हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है

मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है

उधर जमहूरियत का ढोल पीटे जा रहे हैं वो

इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है, नवाबी है

लगी है होड़-सी देखो अमीरी औ' गरीबी में

ये गांधीवाद के ढांचे की बुनियादी खराबी है.

कई बार सोचता हूं कि क्या अदम के साथ साहित्य जगत ने अन्याय किया है? किया है तो क्यों किया है? क्या इसलिए कि उनकी कलम से गुलाब नहीं महके. क्या इसलिए कि अदम के लिए गांव सिर्फ विषय नहीं, जीवन रहा. शायद विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को अपनी कालीन पर मिट्टी से सने पैर मंजूर नहीं थे. अदम की मौजूदगी से उनका अभिजात्य खतरे में पड़ता था. यह केवल उपेक्षा नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित साहित्यिक चुप्पी थी. वातानुकूलित कमरे में खिड़की, दरवाजे बंद रहते हैं. वहाँ बाहर की हवा को संदेह से देखा जाता है. और अदम गोंडवी तो वही कवि थे, जो समाज के झरोखों से भीतर झाँकते थे—बिना अनुमति, बिना संकोच. जिस अदम को पाठ्यक्रम का हिस्सा होना चाहिए था उसे कवियों की कतार में बिठा दिया गया. पाठ्यक्रमों में उन्हें शामिल करने का अर्थ होता सुविधाजनक साहित्यिक नैरेटिव को चुनौती देना. इसका अर्थ होता कि छात्र कविता में केवल रस, छंद, अलंकार नहीं, व्यवस्था का चेहरा भी पढ़ते. शायद यही असुविधा अदम की आपराधिक उपेक्षा का कारण रही. अदम का तेवर देखिए-

“सोचिए तो हमको आजादी से आखिर क्या मिला

आज औरत आदमी की भीड़ तिशनाकाम है

ऐब पोशी के लिए चादर है गांधीवाद की

नंगा होने के लिए रजनीश का हम्माम है.”

अदम की कविता उनके लिए है जिनके लिए अब कोई कविता नहीं लिखता. यह कविता गॉंव,खेत,गरीब,

असहाय, दलित, मज़दूर,मज़लूम महिला की है. ऐसी कविता को मार्क्स ने मनुष्यता की मातृभाषा कहा था. जिससे मिट्टी और पसीने की बू आती है. एक और रचना देखिए-

जितने हरामखोर थे कुर्बो-जवार में

परधान बनके आ गए अगली कतार में

दीवार फांदने में यूं जिनका रिकॉर्ड था

वे चौधरी बने हैं उमर के उतार में

जब दस मिनट की पूजा में घंटों गुजार दें

समझो कोई गरीब फंसा है शिकार में.”

हिंदी साहित्य के इतिहास में कई ऐसे मौके आए हैं, जब हाशिए पर रखे कवियों को किसी गंभीर और दूरदर्शी आलोचक ने उसका वाजिब स्थान दिलाया. आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रीतिकाल के कवियों को केवल श्रृंगार तक सीमित मानने की प्रवृत्ति का विरोध किया. उन्होंने सूरदास और जायसी जैसे कवियों को नई प्रतिष्ठा दी. तुलसी और कबीर के लिए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने जतन किए. आचार्य जी ने कबीर और तुलसी को रूढ़ धारणाओं से बाहर निकालकर उनकी व्यापक मानवीय चेतना को सामने रखा. उन्होंने कबीर को केवल साधु नहीं, “वाणी का डिक्टेटर” कहा और तुलसी के काव्य में लोकमंगल की साधना को स्थापित किया. हिंदी साहित्य में तुलसी को जो सर्वोच्च स्थान मिला, उसमें ऐसे आलोचकों की बड़ी भूमिका रही. मुक्तिबोध को नामवर जी ने पहचाना. अदम गोंडवी को लेकर आज कुछ वैसा ही महत्वपूर्ण काम कवि, आलोचक डॉ. जय नारायण बुधवार कर रहे हैं. लम्बे समय तक अध्यापन में रत डॉ साहब आज के दौर के उन विरले आलोचकों में हैं, जिनकी दृष्टि निष्पक्ष और जनपक्षधर है. उनकी किताब ‘जनवादी अदम गोंडवी’ अदम के साहित्य को समझने की एक गंभीर कोशिश है.

डॉ. जय नारायण बुधवार का प्रयास इस बात का प्रमाण हैं कि सच्चा साहित्य अंततः अपना रास्ता खोज ही लेता है. अदम की ग़ज़लें आने वाले समय में भी इसी तरह सांस लेती रहेंगी- सवाल की तरह, प्रतिरोध की तरह, और सबसे बढ़कर जनता की आवाज़ की तरह. अदम को न देख पा रही व्यवस्था और अकादमियां हमारे समय के शुतरमुर्ग हैं. यह हीनता उनकी है, हिंदी की नहीं. हिंदी के समाज की नहीं. हिंदी के सच की नहीं. सच सूरज की तरह निकलता ही है ।

विज्ञापन

विज्ञापन

जरूरी खबरें