Thu, 22 Oct 2026
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परसपुर गोंडा : दक्ष यज्ञ एवं सती चरित्र प्रसंग का हुआ मार्मिक वर्णन, श्रद्धालु गहन भक्ति और भावनाओं में डूबे

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नीरज कुमार सिंह संवाददाता परसपुर गोंडा / Sat, Mar 21, 2026 / Post views : 429

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परसपुर गोण्डा। परसपुर नगर पंचायत राजपुर स्थित मां गूँगी भवानी मंदिर प्रांगण में गूँगी भवानी सेवा समिति के तत्वावधान में आयोजित श्रीमद देवीभागवत पाठ एवं संगीतमयी श्रीरामकथा के क्रम में नवरात्रि के तीसरे दिन शनिवार को दक्ष यज्ञ एवं सती चरित्र का अत्यंत भावपूर्ण, विस्तृत एवं क्रमबद्ध प्रसंग प्रस्तुत किया गया। कथाव्यास पंडित सूरज जी महाराज (अवध धाम) ने अपने ओजस्वी प्रवचन में इस प्रसंग का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए बताया कि प्रजापति दक्ष, जो भगवान ब्रह्मा के मानस पुत्र थे, अत्यंत अहंकारी स्वभाव के थे। उनकी पुत्री सती ने भगवान शिव को पति रूप में स्वीकार किया, किन्तु दक्ष को यह विवाह स्वीकार नहीं था। इसी कारण उनके मन में भगवान शिव के प्रति विरोध और द्वेष की भावना उत्पन्न हो गई थी।

कथाव्यास ने बताया कि एक समय प्रजापति दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने सभी देवी-देवताओं, ऋषि-मुनियों को आमंत्रित किया, किन्तु जानबूझकर भगवान शिव और माता सती को निमंत्रण नहीं भेजा। जब माता सती को इस यज्ञ की जानकारी हुई, तो उन्होंने भगवान शिव से वहां जाने की इच्छा प्रकट की। भगवान शिव ने उन्हें समझाया कि बिना निमंत्रण के जाना उचित नहीं है, परन्तु सती ने अपने पिता के घर जाने की बात कहते हुए आग्रह किया और अंततः वे यज्ञ स्थल पर पहुंच गईं। वहां पहुंचने पर माता सती ने देखा कि यज्ञ में उपस्थित सभी देवताओं का सम्मान किया जा रहा है, किन्तु भगवान शिव का कहीं भी स्थान नहीं है। इतना ही नहीं, प्रजापति दक्ष ने भगवान शिव के प्रति अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया। यह सुनकर माता सती अत्यंत व्यथित और क्रोधित हो उठीं।

कथाव्यास ने कहा कि सती ने सभा के मध्य अपने पिता के इस व्यवहार का कड़ा विरोध किया और कहा कि जिन भगवान शिव को वे अपना सर्वस्व मानती हैं, उनके अपमान को वे सहन नहीं कर सकतीं। इसके पश्चात माता सती ने यह निर्णय लिया कि जिस शरीर ने ऐसे पिता के घर जन्म लिया, वह शरीर उनके लिए व्यर्थ है। उन्होंने यज्ञ अग्नि में स्वयं को समर्पित कर दिया।इस मार्मिक प्रसंग का वर्णन करते हुए कथाव्यास ने बताया कि जब भगवान शिव को इस घटना का ज्ञात हुआ, तो वे अत्यंत क्रोधित हो उठे। उन्होंने अपने जटाओं से वीरभद्र को उत्पन्न किया और उसे यज्ञ को विध्वंस करने का आदेश दिया। वीरभद्र ने यज्ञ स्थल पर पहुंचकर यज्ञ को तहस-नहस कर दिया और प्रजापति दक्ष का वध कर दिया। बाद में देवताओं और ब्रह्मा जी के अनुरोध पर भगवान शिव का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने दक्ष को जीवनदान दिया, किन्तु उसका सिर बकरे का लगा दिया गया।

कथाव्यास पंडित सूरज जी महाराज ने इस प्रसंग के माध्यम से बताया कि अहंकार मनुष्य के पतन का कारण बनता है, जबकि भक्ति, विनम्रता और समर्पण जीवन को ऊंचाइयों तक ले जाते हैं। माता सती का त्याग और भगवान शिव के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा हमें यह सिखाती है कि अपने आराध्य के प्रति सच्ची निष्ठा ही जीवन का सबसे बड़ा धर्म है। कार्यक्रम के दौरान श्रद्धालु इस भावपूर्ण कथा को सुनकर भाव-विभोर हो उठे और पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। अंत में भजन-कीर्तन का आयोजन हुआ, जिसमें श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया और 'हर हर महादेव' व 'जय माता दी' के जयघोष से पूरा परिसर गूंज उठा। इस अवसर पर समिति के अध्यक्ष विवेक सोनी, राज कुमार सोनी पत्रकार, सुभाष तिवारी, रघुनायक तिवारी, रघुवीर मिश्रा, बउरे तिवारी, कृष्ण कुमार सैनी, सोनू मिश्रा सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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