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: मुश्किल में आ गए हरियाणा के सीएम मनोहर लाल: 'दिल्ली दरबार' की हाजिरी से अफसरों पर ढीली पड़ी मुख्यमंत्री की पकड़!

आर के पाण्डेय एडिटर इन चीफ बैज़लपुर उत्तर प्रदेश / Wed, Nov 24, 2021 / Post views : 131

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कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला कहते हैं, हरियाणा में व्यापम से भी बड़ा भर्ती घोटाला हुआ है। ये घोटाला पर्ची-खर्ची से बढ़कर अटैची तक पहुंच गया है। हरियाणा लोक सेवा आयोग, अब हरियाणा पोस्ट सेल काउंटर बन गया है। 32 से अधिक पेपर लीक और भर्ती घोटाले उजागर किए गए हैं, लेकिन मनोहर सरकार ने कभी इस ओर ध्यान ही नहीं दिया…

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल अब एकाएक मुश्किल में आ गए हैं। विपक्ष को बैठे बिठाए एक अहम मुद्दा मिल गया है। हरियाणा लोक सेवा आयोग और हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग में हुए घोटाले पर विपक्ष ने जिस तरह से मनोहर सरकार पर हमला बोला है, उससे साबित होता है कि बेलगाम अफसरों पर मुख्यमंत्री की पकड़ नहीं रही। प्रदेश के सीआईडी महकमे के कामकाज पर भी सवाल उठ रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार रविंद्र कुमार बताते हैं, मुख्यमंत्री की नाक के नीचे इतना बड़ा घोटाला होना सामान्य बात नहीं है। मुख्यमंत्री, केवल ये कह कर पल्ला नहीं झाड़ सकते कि वे जांच करा रहे हैं। किसी को छोड़ेंगे नहीं। दरअसल, उनके कार्यालय तक हर तरह का फीड बैक नहीं पहुंचता। वे 'खर्ची-पर्ची' का राग अलापकर 'दिल्ली दरबार' की राजनीति को मैनेज करने में व्यस्त रहते हैं। नौकरशाहों ने लंबे समय से प्रदेश में चले अशांत माहौल का खूब फायदा उठाया है। हरियाणा में नौकरी एक बड़ा मुद्दा रहा है। विपक्ष ने इसे हाथों-हाथ लिया है। नौकरी घोटाला, सीएम खट्टर और भाजपा पर 'दाग' लगा सकता है।


क्या वाकई प्रदेश के अफसर, मुख्यमंत्री की नहीं सुन रहे

जब 2014 में मनोहर लाल जब पहली बार मुख्यमंत्री पद बने तो उन पर विपक्ष ने नौसिखिया होने का आरोप लगाया था। नवंबर 2014, फरवरी 2016 और अगस्त 2017 में तीन बड़े कांड हो गए। दर्जनों लोग मारे गए और अरबों रुपये की सरकारी एवं निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचा। खट्टर को प्रदेश के सीएम की कमान संभाले हुए चार-पांच माह हुए थे कि बरवाला आश्रम कांड हो गया। विपक्ष का आरोप था कि सरकार इस मामले को संभालने में पूरी तरह नाकाम रही है। हालत ऐसी थी कि सरकार, अदालत के आदेशों पर अमल करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी।

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने जब आश्रम खाली कराने और आरोपी रामपाल की गिरफ्तारी के लिए समयसीमा तय की तो सरकार को आगे बढ़ाना पड़ा। उसके बाद वहां जो कुछ हुआ, उससे प्रदेश सरकार की कार्यशैली पर धब्बा लगा था। दो साल बाद फरवरी 2016 में आरक्षण आंदोलन की आग ने प्रदेश को अपनी चपेट में ले लिया। कई दिनों तक प्रदेश जलता रहा। दर्जनों लोग मारे गए। अरबों रुपयों की संपत्ति, आग की भेंट चढ़ा दी गई। अगस्त 2017 में पंचकुला में बाबा राम रहिम के समर्थकों ने उत्पात मचा दिया। एक बार फिर खट्टर सरकार पर सवाल खड़े हो गए।


कहां व्यस्त रहता है प्रदेश का सीआईडी महकमा?
प्रदेश के रिटायर्ड अफसर बताते हैं कि मुख्यमंत्री मनोहर लाल पर विपक्ष ने जो नौसिखिया होने का आरोप लगाया था, वह गलत नहीं था। प्रदेश में कई आईएएस और आईपीएस, ऐसे पदों पर बैठाए गए, जिनकी निष्ठा संदिग्ध रही है। यहां तक कि सीआईडी महकमा, जो मुख्यमंत्री को रिपोर्ट करता है, वहां पर भी सीएम गच्चा खा गए। कभी डीजी बदलना पड़ा तो कभी आईजी। उसके बाद भी प्रदेश में कांड होते रहे। एक पूर्व आईएएस ने बताया, मुख्यमंत्री को प्रदेश और विभागों के बारे में सही तथ्यों वाली रिपोर्ट नहीं भेजी जाती। सरकार में कौन से पद पर किसे बिठाना है, इस मामले में तो मुख्यमंत्री की रणनीति पूरी तरह फेल रही है। सीआईडी महकमा, कहां पर और कैसे नजर रखेगा, ये तय करने में भी मुख्यमंत्री चूक गए।

मुख्यमंत्री से बहुत सी डेली रिपोर्ट छिपाई गई हैं। जब मीडिया में कोई घोटाला उछलता है तो मुख्यमंत्री आगे आते हैं। कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला कहते हैं, हरियाणा में व्यापम से भी बड़ा भर्ती घोटाला हुआ है। ये घोटाला पर्ची-खर्ची से बढ़कर अटैची तक पहुंच गया है। हरियाणा लोक सेवा आयोग, अब हरियाणा पोस्ट सेल काउंटर बन गया है। 32 से अधिक पेपर लीक और भर्ती घोटाले उजागर किए गए हैं, लेकिन मनोहर सरकार ने कभी इस ओर ध्यान ही नहीं दिया। एचपीएससी के ताजा घोटाले में डेंटल सर्जन भर्ती के लिए 25-25 लाख रुपये लिए जा रहे थे। हरियाणा सरकार के जूनियर अधिकारी, किसी बड़े नेता की आड़ में इस घोटाले को अंजाम देते रहे। रणदीप सुरजेवाला ने कहा, हरियाणा सरकार को हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में इस मामले की जांच करानी चाहिए।


'दिल्ली दरबार' की राजनीति में फंसे हैं मनोहर लाल!
प्रदेश सरकार और राजनीति को करीब से देखने वाले पत्रकार रविंद्र कुमार का कहना है, इसमें कोई दो राय नहीं है कि प्रदेश के अशांत माहौल का अधिकारियों ने खूब फायदा उठाया है। पहले कई कांड हो गए, उसके बाद कोरोना व किसान आंदोलन ने प्रदेश सरकार को व्यस्त रखा। अगर यूं कहें कि प्रदेश के कई नौकरशाह बेलगाम हुए हैं तो गलत नहीं होगा। मुख्यमंत्री, इन मामलों में उलझे रहे। दूसरा, उन्हें नियमित तौर पर दिल्ली दरबार में हाजिरी लगानी पड़ती है। कुछ काम ऐसे होते हैं, जिनके लिए दिल्ली से आदेश आ जाते हैं। किसान आंदोलन में खुद सीएम और उनके मंत्रियों को विरोध का सामना करना पड़ा। चूंकि उनकी सरकार में जजपा भी शामिल है, इसलिए मंत्रिमंडल में विभागों के बंटवारे को लेकर भी खींचतान रही है। जब शराब की खेप पकड़ी गई तो डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला और गृह मंत्री अनिल विज आमने-सामने हो गए थे।

बतौर रविंद्र कुमार, जिस तरह से एक मुख्यमंत्री को अफसरों के साथ तालमेल कर उनसे विभागों एवं योजनाओं का सटीक फीडबैक लेना चाहिए, वह मनोहर सरकार में संभव नहीं हो सका। कुछ अधिकारियों ने रिपोर्ट भेजी, मगर सच्चाई से वे दूर जाती हुई नजर आईं। मौजूदा कार्यकाल में दो उपचुनावों की हार भी सीएम मनोहर को परेशान कर रही है। राजनीति मैनेज करने के चक्कर में उनका प्रदेश की नौकरशाही पर नियंत्रण कमजोर पड़ा है, ये बात सही है। किसान मुद्दे का हल निकट आने के बाद भाजपा ने राहत की सांस ली थी। पेट्रोल डीजल के दाम भी कम हुए थे। अब एकाएक एचपीएससी के इस घोटाले ने मनोहर सरकार को मुसीबत में डाल दिया है। विपक्ष को बैठ-बिठाए एक ठोस मुद्दा मिल गया। प्रदेश में नौकरी का मुद्दा बहुत अहम रहा है। ये बीस-पच्चीस लाख युवाओं और उनके परिजनों पर असर डाल सकता है। जिन्हें नौकरी नहीं मिली, वे ऐसा सोच सकते हैं कि प्रदेश में बिना खर्ची-पर्ची के सरकारी नौकरी मिलना, महज एक शिगूफा है।

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