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: सोहरत और दौलत जिसके कदम चूमती थी, मौत के वक्त जिस क्रांतिकारी के पास अपनी कफ़न तक के पैसे नहीं बचे...

आर के पाण्डेय एडिटर इन चीफ बैज़लपुर उत्तर प्रदेश / Thu, Feb 5, 2026 / Post views : 150

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"मौत के वक्त जिस क्रांतिकारी के पास अपनी कफ़न तक के पैसे नहीं बचे… वो भारत का सबसे अमीर वकील था!"
यह पढ़ते हुए अगर आपकी रूह न कांप जाए, तो कहना। आज कहानी उस इंसान की, जिसने मौत को गले लगाने से पहले अपनी अपनी 'अहंकार' ही नहीं, अपनी 'औलाद का निवाला' तक देश के नाम कर दिया।
​हम बात कर रहे हैं 'देशबंधु' चितरंजन दास की।
​एक पल के लिए अपनी आँखें बंद कीजिए और इस मंजर की कल्पना कीजिए
एक शख्स जो उस जमाने में ₹50,000 महीना कमाता था (आज के करोड़ों रुपए)। जिसके ठाठ ऐसे थे कि अंग्रेज भी उनसे हाथ मिलाने को तरसते थे। लेकिन जब भारत माँ की सिसकियाँ उनके कानों में पड़ीं, तो उस इंसान ने अपनी भरी-पूरी गृहस्थी को श्मशान बना लिया।
​दिल को छलनी कर देने वाली हकीकत
चितरंजन दास ने अपनी पूरी जायदाद, अपना आलीशान बंगला, अपनी पाई-पाई दान कर दी। लोग पागल कहते थे उन्हें! कहते थे— "चितरंजन, बच्चों के लिए तो कुछ छोड़ दो!"
लेकिन उस 'पागल' ने रोते हुए जवाब दिया था— "पूरा देश ही तो मेरा बच्चा है, क्या मैं अपनी माँ को भूखा रखकर अपने बच्चों की तिजोरी भरूँ?"
​वो अंतिम क्षण…
जब उनकी मृत्यु हुई, तो उनके पास खुद की कोई जमीन नहीं थी, कोई बैंक बैलेंस नहीं था। जो इंसान मखमल पर सोता था, उसकी अंतिम विदाई एक फकीर की तरह हुई। महात्मा गांधी जब उनकी देह के पास पहुँचे, तो बिलख-बिलख कर रो पड़े थे। गांधीजी ने देखा कि जिस आदमी ने लाखों दान किए, आज उसके परिवार के पास भविष्य के नाम पर सिर्फ 'अंधेरा' और 'गर्व' बचा है।
​आज हम कहाँ खड़े हैं?
हम आज चंद रूपयों के लिए अपनों का गला काट देते हैं, और एक वो 'मसीहा' था जिसने हमारे कल के लिए अपना आज राख कर दिया। उनकी पत्नी के पास पहनने को दूसरी साड़ी तक नहीं बची थी, क्योंकि सब कुछ 'देश' का हो चुका था।
​मेरी कलम काँप रही है यह लिखते हुए…
क्या आज की पीढ़ी को पता भी है कि हम जिस आजादी की हवा में सांस ले रहे हैं, उसके पीछे चितरंजन दास जैसे लोगों के भूखे पेट और खाली जेबों की दास्तान है?
​ऐ मेरे देश के लोगों!
अगर आज इस महादानी, इस 'देश के यार' के लिए आपकी आँखों से एक बूंद आँसू भी न गिरे, तो समझ लेना कि हमारे अंदर का इंसान और इंसानियत ख़त्म हो चुकी है।

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