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“राजमाता के हलफनामे से खुला विवादित ढांचे के ध्वंस का रास्ता” (राजमाता श्रीमती विजया राजे सिंधिया जी की पुण्यतिथि पर सादर..)

तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की उपस्थिति में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारिकाप्रसाद मिश्र के लगातार जुबानी हमले को वे सह नहीं पाईं। उनको लगा कि यह उस ग्वालियर घराने का अपमान है, जिसने भारत विभाजन के बाद लगभग 55 करोड़ रुपए देकर कांग्रेस सरकार को संकट से उबारा था। वे उस सभा से उठकर चली आईं और इसका परिणाम यह हुआ कि मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार ने बहुमत खो दिया। वे थीं राजमाता विजया राजे सिंधिया जी !!

उन्हें मुख्यमंत्री पद का ऑफर दिया गया, लेकिन उन्होंने गोविंद सिंह को मुख्यमंत्री बनवाया। इसके बाद मध्यप्रदेश में जनसंघ फैलता ही गया। राजमाता सिंधिया जी को नानाजी देशमुख ने जनसंघ की सदस्यता दिलवाई थी।

उनके जीवन के सबसे बड़े संघर्ष और समर्पण का इम्तिहान आपातकाल में आया, जब श्री माधवराव सिंधिया माँ और बहनों को छोड़कर नेपाल चले गए और राजमाता को संदेश भिजवाया कि वे भी सुरक्षित रहने के लिए नेपाल चली आएं। राजमाता को पुत्र का यह फैसला और व्यवहार कायराना लगा। उन्होंने न केवल पुत्र को धिक्कारा, बल्कि नेपाल के रास्ते से वापस लौटकर इमरजेंसी में जेल में रहना स्वीकार किया। वे तिहाड़ जेल में जयपुर की राजमाता गायत्री देवी जी के बगल वाली कोठरी में बंद रहीं। यह वह स्थिति थी, जब उनकी प्राणों से प्यारी बेटियों को यह भी पता नहीं था कि उनकी अम्मा कहां हैं!

उसी दौर में मेजर जसवंत सिंह जी (पूर्व केंद्रीय मंत्री) राजमाता को सहयोग करने के कारण निकट आए। 1989 में झालावाड़ से चुनाव लड़ने का आग्रह राजमाता से ही किया गया था। लेकिन वे चुनावी राजनीति से दूर हो चुकी थीं। इसके बाद तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष श्री भैरोंसिंह शेखावत के द्वारा श्रीमती वसुंधरा राजे को झालावाड़ से चुनाव लड़वाने का आग्रह किया गया। यह आग्रह श्रीमती राजे के अनमनेपन के बावजूद राजमाता के हस्तक्षेप के कारण टाला नहीं जा सका। और, राजस्थान को यशस्वी माता की विजनरी पुत्री के रूप में प्रभावशाली नेतृत्व प्राप्त हुआ।

एक समय वह आया, जब राजमाता सिंधिया जी ने अपने को रामजन्मभूमि आंदोलन को पूर्णतः समर्पित कर दिया। देश में उनका इतना महत्व था कि उनके हलफनामे के कारण ही बाबरी ढांचे के ध्वंस का अध्याय लिखा जा सका।

निस्संदेह वे भारत और भारतीय जनता पार्टी की अब तक की श्रेष्ठतम महिला नेता रही हैं। उन्हें कभी भी आरोपित या कलंकित सिद्ध नहीं किया जा सका।

आजादी के बाद भारत की मातृशक्ति की सशक्त प्रतीक के रूप में राजमाता सिंधिया जी का कोटिशः अभिनंदन !!

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