
मेरी लाश को गाँव मत ले जाना…” — फाँसी से पहले राजगुरु ने अपनी माँ से क्या कहा था?
हम अक्सर कहते हैं कि 23 मार्च को तीन शेर हँसते-हँसते फाँसी पर झूल गए। लेकिन क्या हमने कभी उस ‘माँ’ के बारे में सोचा, जिसका जवान बेटा उस दिन हमेशा के लिए सो गया?
आज बात करेंगे शहीद शिवराम राजगुरु की।
वो आखिरी मुलाक़ात
फाँसी से कुछ दिन पहले राजगुरु की माँ उनसे जेल में मिलने आईं। माँ का कलेजा फटा जा रहा था, आँखों में आँसू थे। लेकिन 22 साल के राजगुरु की आँखों में एक अजीब सी चमक थी।
उन्होंने अपनी माँ का हाथ पकड़ा और कहा, “माँ, रोना मत। अगर तू रोएगी तो दुनिया कहेगी कि राजगुरु की माँ कमजोर थी। गर्व करना कि तेरा बेटा वतन के काम आया।”
एक माँ की वो गरीबी और वो गरिमा
राजगुरु की शहादत के बाद उनकी माँ की हालत बहुत खराब हो गई थी। उनके पास खाने तक के पैसे नहीं थे। कहा जाता है कि एक बार किसी ने उन्हें कुछ पैसे देने चाहे, तो उस बूढ़ी माँ ने हाथ पीछे खींच लिए और गर्व से कहा—
”मेरे बेटे ने देश के लिए जान दी है, मैंने उसे बेचा नहीं है। मैं मेहनत करके भूखी सो जाऊँगी, लेकिन अपने बेटे की शहादत का सौदा नहीं करूँगी।”
शहादत की वो रात
जब अंग्रेजों ने चोरी-छिपे सतलुज नदी के किनारे उनके शवों को जलाया, तो उस माँ को अपने बेटे का आखिरी दीदार तक नसीब नहीं हुआ। वो रात भर अपने घर के आँगन में बैठकर आसमान को ताकती रही, शायद उसे पता था कि उसका ‘शिवा’ अब आसमान का सबसे चमकता सितारा बन गया है।
आज का कड़वा सवाल
आज हम अपनी माँ की एक छोटी सी बात नहीं मानते, और उस माँ ने अपना पूरा संसार देश के नाम कर दिया। क्या हम इतने स्वार्थी हो गए हैं कि इन बलिदानों को याद करने के लिए हमारे पास 2 मिनट का भी समय नहीं है?
अगर इस कहानी को पढ़कर आपकी आँखें नम हुई हैं to जरूर सोचेंगे



